
अचानकमार में बाघ की मौत पर सवाल,
6 दिन बाद क्यों जागा वन विभाग, बाघ की मौत का कारण क्या बताया,,
नीलकमल सिंह ठाकुर
मुंगेली (लोरमी)- अचानकमार टाइगर रिज़र्व में एक बाघ की संदिग्ध मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभाग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मौत का कारण दो बाघों के बीच आपसी संघर्ष बताया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत और स्थानीय सूत्रों की जानकारी इस दावे से मेल नहीं खाती।
सूत्रों के अनुसार, जंगल में मिला बाघ का शव कम से कम 5 से 6 दिन पुराना था। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि—

अगर रिज़र्व में नियमित पेट्रोलिंग होती है, तो बाघ की मौत का पता इतने दिनों तक क्यों नहीं चला?क्या पेट्रोलिंग सिस्टम फेल हुआ या जानकारी दबाई गई?
अचानकमार जैसे संवेदनशील टाइगर रिज़र्व में बाघ का शव कई दिनों तक जंगल में पड़ा रहना, विभागीय निगरानी व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है।
क्या गश्त नहीं हो रही थी?
या फिर जानबूझकर मामले को दबाने की कोशिश की गई?

मीडिया से दूरी, सवालों से परहेज़
स्थानीय पत्रकारों का आरोप है कि अचानकमार प्रबंधन लगातार मीडिया से दूरी बनाए रखता है। अधिकांश घटनाओं में जानकारी साझा नहीं की जाती और जब मामला सार्वजनिक हो जाता है, तब औपचारिकता निभाते हुए एक तैयारशुदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी जाती है।
इस मामले में भी यही देखने को मिला—
बाघ की मौत की खबर सामने आने के अगले ही दिन विभाग ने लंबी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी, लेकिन कई अहम सवालों पर चुप्पी साध ली गई।
अब भी अनुत्तरित हैं ये सवाल
6 दिन पुराने शव की पहचान विभाग ने सिर्फ एक दिन में कैसे कर ली?
अगर नियमित पेट्रोलिंग हो रही थी, तो शव सड़ता-गलता जंगल में कैसे पड़ा रहा?
स्थानीय मीडिया को मौके पर क्यों नहीं बुलाया गया?
क्या विभाग का उद्देश्य पारदर्शिता था या खुद को “क्लीन चिट” देना?
‘आपसी संघर्ष’ का दावा और बढ़ते संदेह
विभाग द्वारा मौत का कारण “दो बाघों का आपसी संघर्ष” बताए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं।

यदि ऐसा ही था, तो—
दूसरे बाघ की ट्रैकिंग पहले क्यों नहीं की गई?
कैमरा ट्रैप इतने दिनों तक क्या निष्क्रिय थे?
फील्ड स्टाफ ने समय रहते रिपोर्ट क्यों नहीं की?
शव की हालत देखकर यह स्पष्ट था कि मौत हाल की नहीं थी, इसके बावजूद जल्दबाज़ी में निष्कर्ष निकालना संदेह को और गहरा करता है।
छुपाने की कोशिश विभाग की साख पर भारी
अचानकमार टाइगर रिज़र्व को देश के सुरक्षित बाघ आवासों में गिना जाता है। लेकिन यदि इस तरह गंभीर घटनाओं को दबाने या नियंत्रित रिपोर्टों से ढकने की कोशिश होती रही, तो यह न केवल विभाग की विश्वसनीयता, बल्कि संरक्षण व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करेगा।
जवाबदेही जरूरी, जनता जानना चाहती है सच
बाघ राष्ट्रीय पशु है और उसकी मौत कोई सामान्य घटना नहीं।

जनता और मीडिया अब वन विभाग से स्पष्ट जवाब चाहती है—
क्या निगरानी प्रणाली कमजोर है?
क्या बाघों की वास्तविक स्थिति छुपाई जा रही है?
क्या घटना को “नेचुरल बिहेवियर” बताकर जिम्मेदारी से बचा जा रहा है?
अब मांग तेज हो रही है कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो, ताकि सच्चाई सामने आ सके।
सवाल आज भी वही है—
“आखिर 6 दिन तक बाघ का शव जंगल में सड़ता रहा और वन विभाग सोता रहा?”

