


सच्चीपुरम कालोनी की महिलाओं ने की हलषष्ठी भगवान की पूजा, इस दिन संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए माताएं रखती हैं उपवास, जानिए महत्त्व और पौराणिक कथा,,
नीलकमल सिंह ठाकुर
मुंगेली- भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला हलषष्ठी व्रत संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। इसे छत्तीसगढ़ समेत देश के कई हिस्सों में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में इस पर्व को स्थानीय रूप से खमरछठ या खमरछठी के नाम से भी जाना जाता है।

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी सच्चीपुरम कालोनी में सिद्धेश्वर महादेव, इच्छापूर्ति पंचमुखी हनुमान मंदिर के सामने सभी मोहल्ले की महिलाएं बड़ी संख्या में पहुंचकर हलषष्ठी की पूजा अर्चना की और कथा की श्रवण किए।
इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली के लिए निर्जला अथवा उपवास रखती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार हलषष्ठी माता की पूजा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

भगवान बलराम से जुड़ा है पर्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार हलषष्ठी तिथि भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम के जन्म से जुड़ी मानी जाती है। भगवान बलराम का प्रमुख अस्त्र हल था, इसलिए इस व्रत को हलषष्ठी कहा गया। इस दिन हल और कृषि से जुड़े कार्यों का विशेष महत्व माना जाता है।
मान्यता है कि हलषष्ठी के दिन माताएं खेत में हल से बोए गए अनाज और कुछ विशेष प्रकार की फसलों का सेवन नहीं करतीं। पूजा में भी स्थानीय परंपराओं के अनुसार पसहर चावल, महुआ, लाई, भुना हुआ अनाज और अन्य सामग्री का उपयोग किया जाता है।

हलषष्ठी व्रत की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक ग्वालिन अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव में शामिल होने जा रही थी। रास्ते में उसे प्रसव पीड़ा हुई और उसने एक पेड़ के नीचे बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद वह बच्चे को वहीं छोड़कर आगे बढ़ गई।
कथा के अनुसार रास्ते में खेत में हल चल रहा था। हल की चोट से वहां मौजूद एक बालक घायल हो गया। ग्वालिन ने भय के कारण उस घटना को छिपाने का प्रयास किया। बाद में उसे अपनी भूल का एहसास हुआ और उसने भगवान से क्षमा मांगी। इसी कथा से संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए हलषष्ठी व्रत रखने की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।

पूजा-अर्चना कर संतान के लिए मांगती हैं आशीर्वाद
हलषष्ठी के दिन महिलाएं सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद घर या पूजा स्थल पर हलषष्ठी माता की पूजा-अर्चना की जाती है। महिलाएं सामूहिक रूप से कथा सुनती हैं और संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य तथा उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं।

छत्तीसगढ़ में खमरछठ का पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों और लोक आस्था से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं समूह में पूजा करती हैं और एक-दूसरे को व्रत की शुभकामनाएं देती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत मातृत्व, संतान के प्रति प्रेम और परिवार की खुशहाली की कामना का प्रतीक माना जाता है।

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